छ.ग. के ग्रामीण विकास में कृषि श्रमिकों एवं रोजगार की भूमिका
आर्थिक विकास के विषेष संदर्भ में
Dr. (Mrs.) Vrinda Sengupta1, Dr. Satish Ahrawal2
1Asstt. Prof. (Sociology), Govt. T.C.L. P.G. College, Janjgir (C.G.)
2Asstt. Prof. (Commerce), Govt. T.C.L. P.G. College, Janjgir (C.G.)
भारत निर्माण के लिए नारे को अमलीजामा पहनाने के लिए ईमानदारी से जो काम करने की जरूरत है, वह ग्रामीण ढाँचागत सुविधाओं के लिए देश भर में समान गुणवŸाा मानकांे को लागू करने की है। शहरी स्तर पर विश्व स्तर की सुविधाएँ विकसित करने लक्ष्य तय किए जा रहे हैं। उसी तरह ग्रामीण ढाँचागत सुविधाएँ भी उच्च स्तर की हों, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ग्रामीण भारत की स्थिति में भारी बदलाव लाने की जरूरत है और उसके लिए बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निवेश करना होगा। इसके साथ ही कई तरह के प्रशासनिक सुधार भी लागू करने होंगे ताकि लक्ष्यों को हासिल करने में तेजी लाई जा सके। जब तक ग्रामीण क्षेत्र में ढाँचागत सुविधाएँ विकसित नहीं होंगी तब तक इसकी विकास की गति को तेज नहीं किया जा सकेगा और इसे अर्थ व्यवस्था की मुख्य धारा में लाने के लिए ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में मजबूती से देश की अर्थ व्यवस्था मजबूत हो सकेगी। आार्थिक विकास किसी भी देश के लोगों के आर्थिक व सामाजिक कल्याण का एक सशक्त माध्यम है। आर्थिक विकास से अभिप्राय राष्ट्रीय आय में वृद्धि करके निर्धनता को दूर करना तथा सामान्य जीवन स्तर में सुधार करना है। फलस्वरूप देश में उत्पादन तथा निवेश बढ़ता है। विकास के अंतर्गत जहाँ एक ओैर राष्ट्रीय आय, उत्पादकता रोजगार, आत्मनिर्भरता, पूँजी निर्माण व सामाजिक कल्याण में वृद्धि होती है। दूसरी ओर निर्धनता, विषमताओं, सामाजिक लागतों, असंतुलित विकास, बीमारी, शोषण, उत्पीड़न, एकाधिकारी प्रवृŸिायों में कमी आती है। यह एक सर्वमान्य सत्य है कि आर्थिक विकास का संबंध नगरीकरण के विकास के साथ होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या का नगरीय क्षेत्रों में परिवर्तन आर्थिक विकास की दृढ़ कसौटी है। भारत में नगर जनसंख्या जो 1909 में कुल जनसंख्या का 11 प्रतिशत् थी, धीरे-धीरे बढ़ते हुए सन् 2001 में कुल जनसंख्या 27.8 प्रतिशत् हो गई है। अतः सर्वविदित है कि देश के आर्थिक विकास के साथ-साथ नगरीकरण की प्रवृŸिा में वृद्धि हो रही है। बढ़ते हुए नगरीकरण का विकास प्रभाव व विकास का नगरीकरण पर पड़ने वाले प्रभाव को जानने के पूर्व नगरीकरण को जानना आवश्यक है।
प्रस्तावना:
कृषि क्षेत्र का भारतीय अर्थ व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। कृषि देश का केवल जीविकोपार्जन का साधन या उद्योग धंधा ही नहीं बल्कि अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी एवं विकास की कुँजी है। कृषि का देश के उद्योग धंधे, विदेशी व्यापार, मुद्रा अर्जन, विभिन्न योजनाओं की सफलता एवं देश का आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक विकास भी निर्भर करता है।
2001 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 102.7 करोड़ है। इस कुल आबादी का 72.22 जनसंख्या गाँवों में निवास करती है, जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि क्षेत्र में कुल श्रमिकों का 68.8 प्रतिशत् मजदूरी पर लगा हुआ है तथा 13.5 श्रमिक खनन एवं निर्माण उद्योग में एवं शेष 17.7 प्रतिशत् सेवाआंे में लगा हुआ है। इस प्रकार देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग कृषि कार्य्र पर लगा हुआ है। ”धान का कटोरा“ कहा जाने वाला छŸाीसगढ़ भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश से अलग होकर 01 नवम्बर 2000 को एक राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस नए राज्य की जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार 2,07,959,56 है। इस कुल आबादी का 82.56 प्रतिशत् जनसंख्या 20378 गाँवों मंे निवास करती है, जिनका मुख्य व्यवसाय भी कृषि है। छŸाीसगढ़ को वर्तमान में पूर्णतः कृषि आधारित प्रदेश कहा जाता है। यहाँ की लगभग 63 प्रतिशत् कार्यशील जनसंख्या की आजीविका कृषि से सम्बद्ध है। प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 42.93 (58.4 वर्ग कि.मी.) क्षेत्र कृषि योग्य भूमि है। यहाँ की कृषि पद्धति को परम्परागत तथा लगभग ”मानसून का जुआ“ कहा जा सकता है। अर्थात् मानसून की कृपा हुई तो अच्छा उत्पादन होता हैे एवं वर्ष भर खुशहाली रहती है। अनावृष्टि की स्थिति में अकाल, आर्थिक, दुर्दशा, भूखमरी एवं पलायन जैसे अभिशाप कृषकों व कृषि मजदूरों का दुर्भाग्य बन जाते हैं। साथ ही अतिवृष्टि भी इसी प्रकार की स्थितियाँ निर्मित करती है। मानसून का धोखा व इससे उत्पन्न दुष्चक्र प्रत्येक कुछ वर्षों मंे घटित होते रहे हैं। सिंचाई की सुविधाएँ अपर्याप्त है। कृषि का लगभग 80 प्रतिशत् हिस्सा सिंचाई की पहुँच से दूर है। प्रदेश में एक मानसूनी फसल वह भी मुख्यतः चाँवल की ली जाती है। यही कारण है कि छŸाीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। यहाँ कृषि में सर्वाधिक धान की फसल लगभग 67.46 प्रतिशत् ली जाती है, किन्तु प्रति हेक्टेयर उत्पादन मात्र 8 क्विंटल प्रति एकड़ है जो कि देश के औसत उत्पादन से कम है। इस तथ्य से प्रदेश की कृषि के पिछड़ेपन की तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। कृषि के अलावा आय के अन्य स्र्रोत न होने के कारण कृषकों व कृषि मजदूरों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त खराब रहती है।
भूमिहीन कृषकों के पास खेतों में रोजी-मजदूरी करने के अलावा आय के अन्य स्र्रोत नहीं होते हैं। वर्ष के 5-6 महिनें में कृषि मजदूरी करते हैं और शेष दिनों में वे अपने जिले व राज्य से बाहर कार्य की तलाश में पलायन करते हैं। पर्याप्त मजदूरी एवं आय के स्रोत के अभाव में भूमिहीन कृषकों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति अत्यन्त दयनीय है।
किसी भी देश की उन्नति एवं विकास में इस देश के श्रमिकों का विशेष महत्व होता है। चूँकि श्रम ही एक ऐसा साधन है, जो कृषि, उद्योग, व्यापार एवं अन्य उत्पादन के क्षेत्रों में अपनी सक्रिय भूमिका अदा करता है। श्रम के अभाव में कार्य की शुरूआत ही नहीं की जा सकती। बहुत हद तक देश की सम्पन्नता उस देश के श्रमिकों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है। वर्तमान युग मंे जर्मनी, जापान, अमेरिका, रूस एवं अन्य देशों के विकसित होने के पीछे प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से वहाँ के श्रमिकों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का उन्नयन होता है। यदि हम विकसित देशों की तुलना यहाँ के कृषकों, खेतिहर मजदूरों (भूमिहीन कृषकों) या अन्य श्रमिकों से करें तो हम पाते हैं कि भारतीय श्रमिकों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति निम्न है। ऐसी स्थिति में भारत को आगामी 20 वर्षों में विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में ला खड़ा करने की बात मात्र एक कल्पना ही रह जायेगी। अतएव विकसित राष्ट्र की कल्पना को साकार करने के लिए आवश्यक है कि आर्थिक विकास की गति को तेज करना होगा, साथ ही गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले भूमिहीन कृषकों (खेतिहर मजदूरांे) की आर्थिक-सामाजिक स्थिति को ऊँचा उठाना होगा। यद्यपि इस दिशा में केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से प्रयास किया जा रहा है। इसके बावजूद भी भूमिहीन कृषक आज भी गरीबी, भूखमरी, भिक्षावृŸिा, बेरोजगारी, जातिवाद, अस्पृश्यता, वेश्यावृŸिा, अपराध, बाल अपराध, मद्यपान, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, कुपोषण, आवास की समस्या जैसी गंभीर समस्या से ग्रसित है।
अध्ययन का महत्व:
कृषि उत्पादन में अच्छे बीज, खाद, पौध संरक्षण, उपाय सिंचाई साधन में साथ-साथ कृषि याँत्रिकीकरण एवं कृषि उपकरणों के सही उपयोग का महत्व है। नव विकसित कृषि उपकरणों को अपनाने से कृषकों के श्रम एवं समय की बचत होता है। साथ ही उत्पादकता में भी वृद्धि होती है।
भारत सरकार/राज्य शासन द्वारा प्रायोजित अनेक कार्यक्रम/योजनाओं से 9वीं पंचवर्षीय योजना तक खेत तैयार करने के क्षेत्र में याँत्रिकीकरण के स्तर में प्रतिशत् की वृद्धि हुई है।
कृषि के क्षेत्र मंे तकनीक मंे निरन्तर परिवर्तन आते जा रहे हैं। नवीन तकनीक के तहत् विकसित कृषियंत्रों से न केवल श्रम तथा समय की बचत होती है।
छ.ग.राज्य में कृषि याँत्रिकीकरण को प्रोत्साहन देने का कार्य कृषि अभियाँत्रिकी संचालनालय के माध्यम से किया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त जो कृषक अनुदान पर नव विकसित मँहगे मशीनों को क्रय नहीं कर सकते, उन्हें लाभान्वित करने के लिए राज्य शासन, कृषि अभियाँत्रिकी संचालनालय के माध्यम से डोजर व्हील राईप टैªक्टर के साथ विभिन्न यंत्र, पावर ट्रिलर तथा थे्रसर, रीपर आदि किराए पर उपलब्ध कराये जा रहे हैं।
शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति, कृषि, रोजगार, विज्ञान, अभियाँत्रिकी, चिकित्सा कला व अन्य सभी क्षेत्रों में महिलाओं व पुरूषों को समान अवसर दिए जाने की बात आधुनिक सभ्यता के विकास के साथ ही हो रही है, किन्तु अब तक इस विचारधारा को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है। अपनी असीमित ऊर्जा व कर्मशीलता के कारण कर्मजा महिलाओं के एक बड़े वर्ग ने स्वतः ही समाज में अपनी प्रभुता स्थापित की है किन्तु जब हम किसी भी देश के सुदूर ग्रामीण अंचल में रहने वाली एक नारी की जीवन शैली पर विचार करते हैं तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अभी भी निर्णय लेने के अधिकार से वह कोसों दूर है। उसकी कार्य ऊर्जा का उपभोग तो समाज करता है, किन्तु इसके प्रतिदान के रूप में उसे उस समाज का अंग न मानकर एक यंत्र की तरह प्रयुक्त किया जाता है। खेत से लेकर चैबारे तक हर काम को दक्षतापूर्वक संचालित करने वाली बहुतायत महिलाओं के पास घर या बाहर आज भी महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है, इसके लिए पुरूषों पर वे पूरी तरह अवलम्बित हैं। महिलाओं में शिक्षा का स्तर व औसत बढ़ने के बाद भी कमोबेशी यही स्थिति है। यद्यपि अन्य देशों की तुलना में भारतवर्ष में महिलाओं से संबंधित अनेक विशिष्ट कानून बने हुए हैं, किन्तु उनका परिपालन प्रभाव ढंग से सुनिश्चित नहीं किया जा सका है, चूँकि वे अपने जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी रूप में पुरूषों पर ही आश्रित हैं। अतः सरलतापूर्वक वे महिलाओं को उनकी सम्पŸिा व दूसरे अधिकारों से वंचित कर देते हैं
ग्रामीण विकास योजनाओं के लक्ष्य:
केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की मानी जाए तो इस साल देश में करीब आठ हजार गाँवों को जोड़नेवाली 17000 कि.मी. लम्बी पक्की सड़कें बन जाएँगी, गाँव के 14 लाख से ज्यादा गरीबों को रहने के लिए मकान मिल जाएँगे और लाखों रोजगार सृजित होंगे। 6000 करोड़ रूपये के भारी-भरकम बजट वाले ”काम के बदले अनाज“ कार्यक्रम के तहत् साल भर में 7500 लाख मानव दिवसांे के बराबर रोजगार सृजित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें तीन हजार मानव दिवसों के बराबर रोजगार साल की पहली दो तिमाहियों मंे सृजित होंगे। इसी तरह 4000 करोड़ रूपये के बजट वाली सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना के तहत् वर्तमान विŸा वर्ष में 8611 लाख मानव दिवसों का रोजगार सृजित करने का लक्ष्य है। इसके भी तिमाही लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। 1960 करोड़ रूपये के बजट वाली स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के तहत् 52876 स्व-सहायता समूहों और 8.59 लाख स्वरोजगारियांे को मदद पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। लक्ष्यों की उपलब्धि बैंकों के कर्ज के उपयुक्त प्रवाह पर निर्भर होगी। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना कालक्ष्य भी काफी बड़ा है। चालू वर्ष में इसे 4235 करोड़ रूपये का आबंटन किया गया है और इससे 17454 कि.मी. लम्बी ग्रामीण सड़कें बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के लक्ष्यों की काफी कुछ उपलब्धि राज्यों पर निर्भर है। गाँवों में रहने वाले निर्धनों के लिए आवास की योजना के तहत् केन्द्र ने इस साल 2775 करोड़ रूपये का आबंटन किया है और 14.54 लाख मकान बनाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन यह लक्ष्य हासिल होना राज्यों के योगदान पर निर्भर है।
पेयजल को लेकर भी इस बार आबंटन काफी बड़ा है। 4050 करोड़ रूपये के प्रारूप वाली इस योजना के तहत् पेयजल सुविधा से पूरी वंचित 3522 गाँवों और आँशिक सुविधा वाले सभी 8375 गाँवों मेें पेयजल पहुँचाया जाना है। इसके अलावा पेयजल की स्कीम से छूट गए 34373 गाँवों को भी शामिल किया जाना है। स्कीम में 10000 गाँवों में पानी की गुणवŸाा बेहतर की जानी है और 140000 ग्रामीण स्कूलों को पेयजल उपलब्ध कराया जाना है। 700 करोड़ रूपये के प्रारूप वाले ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की भी है।
मानव जीवन के विकास एवं विस्तार में ब्रह्मास्त्र के रूप में सहायक प्रकार्य शोध प्रक्रिया मानी जा रही है। कोई भी नया शोध कार्य एक ऐसे भवन की तरह होता है, जो पूर्व में हुए शोध कार्य की नींव पर निर्मित किया जाता है। मेरा यह शोध कार्य जिन शोध कार्यों से प्रेरित है, उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:-
1. खेतिहर जाँच समिति (1950-51) ने अपने रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि खेतिहर मजदूर से तात्पर्य उन व्यक्तियों से लिया जाता है जो वर्ष के अधिकाँश दिनों में दूसरांे के खेतों पर कार्य कर प्राप्त मजदूरी से अपना जीविकापार्जन करते हंै।
2. ग्रामीण जाँच समिति (1964-65 एवं 1974-75) ने भी खेतिहर मजदूरों की पहचान बताते हुए कहा है कि ऐसे मजदूर जिनकी आय का मुख्य स्रोत कृषि कार्य से संबंधित है। इसके पश्चात् वर्षों में मजदूरों को संगठित एवं असंगठित श्रेणी में बाँटते हुए भूमिहीन कृषकों को असंगठित क्षेत्र की मजदूरों की श्रेणी में रखा गया।
3. अमिताभ लोहिड़ी (1972-73) ने खेतिहर की पीड़ा से रूबरू होते हुए अपने शोध निष्कर्षों से इस वर्ग की बेरोजगारी एवं असुविधाजनक मानवीय जीवन का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है तथा यह भी स्पष्ट किया है कि देश का वास्तविक आर्थिक विकास इस वर्ग के उत्थान पर ही निर्भर है।
4. सेतुरामन के अनुसार (1976) संगठित क्षेत्र के अंतर्गत नये उद्योगों एवं श्रमिकों के प्रवेश में कठिनाई होती है। अतः श्रमिकों की मजदूरी अधिक होती है, क्योंकि वे संगठित होते हैं, किन्तु इसके विपरीत असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत श्रमिकों की सी उत्पादकता कम होने के कारण इनकी मजदूरी दर कम होती है और अशिक्षा एवं संगठन के अभाव में शोषण के शिकार होते हैं।
5. मजूमदार (1977) ने संगठित एवं असंगठित क्षेत्र की विभिन्नताओं का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि संगठित क्षेत्र में मजदूरी व रोजगार की निश्चितता के कारण मजदूर सुरक्षित होता है तथा इनके लिए शासकीय अनियमों की सुरक्षा भी होती है, किन्तु असंगठित क्षेत्र में संगठन व शिक्षा की कमी, कार्य की अनिश्चितता, कार्य की दशाओं में अत्यधिक शोषण के कारण यह असुरक्षित होता ही है। साथ ही संगठित क्षेत्र की तुलना में आय अत्यन्त कम होती है।
6. पपोला टी.एस. (1980) में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को संगठित (शहरी) क्षेत्र का एक हिस्सा मानते हुए यह स्पष्ट किया है कि असंगठित क्षेत्र में उत्पादकता एवं आय की कमी के कारण उच्च तकनीक एवं सुविधा का अभाव होता है। चूँकि यह क्षेत्र शहरी अर्थ व्यवस्था को मुख्य रूप से प्रभावित करता है। अतएव इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि संगठित एवं संगठित श्रम क्षेत्र में अन्तर को कम किया जा सके।
7. डाॅ. मेहरा मीरा (1985) को अध्ययन असंगठित श्रम क्षेत्र से संबंधित भारतीय अवधारणाओं पर आधारित था। उन्होंने इस क्षेत्र की मूलभूत विशेषताओं एवं इस क्षेत्र का शहरी अर्थ व्यवस्था के संबंध पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया।
उद्देश्य: शोध अध्ययन के उद्देश्य निम्नलिखित है:-
1. कृषि क्षेत्र में भूमिहीन कृषकों की आर्थिक सामाजिक स्थिति को ज्ञात करना।
2. भूमिहीन कृषकों की समस्याओं से अवगत होना।
3. कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त उनके आय के स्त्रोतों को ज्ञात करना।
4. भूमिहीन कृषकों को समाजसेवी संस्थाओं एवं शासन प्रशासन द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं की जानकारी प्राप्त करना।
5. परिकल्पना का परीक्षण करना।
परिकल्पना:
1. कुटीर उद्योग के महत्व को बढ़ावा देना।
2. ग्रामीण रोजगार योजनाओं का प्रचार-प्रसार।
3. कार्यरत् श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक प्रदान करना एवं वर्ष भर मजदूरी की व्यवस्था करना।
4. छ.ग. के बाहर पलायन की रोकथान करना।
5. स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित करना।
छवजम ॅवतजील ब्वदजतपइनजपवद पद जीम पिमसक व िचतवचवेमक ूवता रू
भारतीय अर्थ व्यवस्था रूपी शरीर की रीढ़ कृषि को माना जाता है, क्योंकि देश की जनता का एक बड़ा भाग आज भी कृषि पर आधारित है। इसी कारण भारतीय अर्थ व्यवस्था को ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की संज्ञा दी जाती है।
च्तवचवेमक डमजीवकवसवहल कनतपदह जीम ज्मदनतम व िजीम त्मेमंतबी ॅवता रू
शोध रूपी भवन का निर्माण समंक रूपी भवन सामग्री से किया जाता है। इस तरह शोध कार्य क्षेत्र में समंक ठीक उसी प्रकार महत्वपूर्ण है, जिस प्रकार मानव योनी में शरीर महत्वपूर्ण होता है। इस महत्वपूर्ण हिस्से का संकलन शोध भाषा में शोध प्रविधि के नाम से जाना जाता है।
इस शोध कार्य को सम्पन्न करने के लिए द्वितीयक समंकों का उपयोग किया जायेगा।
श्रमिकों के पिछड़ेपन का कारण:
हमारे देश में बंधुआ श्रम का प्रचलन ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है। ब्रिटिश शासन की भूमि बन्दोबस्त प्रणाली इसके लिए उŸारदायी है। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में खेतिहर मजदूरों को बंधुआ श्रमिक में परिवर्तित किये जाने की प्रवृŸिा को प्रोत्साहन मिला। आज देश में बंधुआ श्रमिकों की संख्या 50 लाख से भी अधिक है। बंधुआ मजदूरी प्रथा के प्रमुख कारण है:-
- निर्धनता: कृषि श्रमिकों का भूमिहीन सम्पŸिाहीन होना।
- रोजगार हेतु दल विशेष ः ऋणग्रस्तता, पीढ़ीगत ऋणग्रस्तता।
पर निर्भरता
- सामाजिक पिछड़ापन ः
भारत में भिन्न-भिन्न राज्यों में बंधुआ मजदूरों का अलग-अलग नामों से जाना जाता है- गुजरात में हाली, उड़ीसा में गोटी, मध्यप्रदेश में हरवाहा, बिहार में कमिया, जम्मू-कश्मीर में माँझी, केरल में बेगार, राजस्थान में साँगड़ी, महाराष्ट्र में पेट या बगारी, उŸारप्रदेश में मरे, तमिलनाडु में पयिरोम, पन्नियल, पश्चिम बंगाल में भतुआ आदि।
बंधुआ मजदूर में ज्यादातर खेतिहर मजदूर, अनुसूचित जाति व जनजाति के श्रमिक (बहुलता से) बल श्रमिक शामिल हैं। इसमें सामूहिक बंधुआ प्रथा अधिक प्रचलित है।
दुष्परिणाम:
- स्वतंत्रता का आघात -पीढ़ी दर पीढ़ी प्रथा शोषण
- आर्थिक दशा दयनीय शोषण -अन्यत्र रोजगार नहीं
- न्यूनतम उत्पादन निम्न जीवन -स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता पर विपरीत स्तर प्रभाव
सरकार के प्रयास:
सरकार बंधुआ श्रमिक उन्मूलन की दिशा में स्वतंत्रता के सामय से ही प्रयासरत् है। बंधुआ श्रमिक उन्मूलन संबंधी कानूनों को पूरी तरह कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक है कि पहले बंधुआ मजदूरों का पता लगाया जाये।
- 1950 भारतीय संविधान लागू होते ही कानूनन बंधुआ मजदूरी प्रतिबंधित हो गई। संविधान के धारा 23 के अंतर्गत बंधुआ एवं जबरन श्रम को निषिद्ध किया गया है।
- 1975 बंधुआ मजदूर उन्मूलन (अधि.) 1976 से लागू।
- बीस सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत ऋण मुक्ति के साथ-साथ बंधुआ मुक्ति का अभियान सम्पूर्ण देश भर में प्रारम्भ किया गया।
- नवीन बीस सूत्रीय कार्यक्रम, 1986 में भी गैर सरकारी संस्थाओं के सहयोग से बंधुआ श्रमिकों को मुक्त कराये जाने का उद्देश्य सम्मिलित किया गया।
- पुनर्वास हेतु राज्यों को केन्द्र द्वारा विŸाीय सहायता।
सुझाव:
बंधुआ मजदूर अधिनियम के तहत् बंधुआ मजदूरों का पता लगाने, उन्हंे मुक्त करना तथा उनका पुनर्वास करने की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है।
1. बंधुआ श्रमिकों की मुक्ति के प्रयास त्रि-स्तरीय होते हैं, पहचान, मुक्ति और पुनर्वास
2. बंधुआ मजदूरों की मुक्ति की पहली शर्त इन्हें पहचानना है, सरकारी एजेन्सियों को इन कार्य में स्वयं सेवी संस्थाओं से भी सहयोग लेना चाहिए।
3. सम्पर्क सर्वेक्षण, प्रचार माध्यम के प्रयोग से इसका पता लगाया जाना चाहिए।
4. ग्रामीण शिक्षा पर बल।
5. श्रमिकों का संगठित करने का प्रयास।
6. सहकारी समितियों एवं बैंकों से ऋण प्राप्त करने की सुविधा।
7. बंधुआ बनाने वालों को मानवीय व कानूनी पहलू समझाते हुए प्रेरित किया जाये।
8. पे्ररणा सफल नहीं होने पर कानूनों के प्रावधानों को सख्ती लागू किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
भारतीय अर्थ व्यवस्था रूपी चक्र की धुरी कृषि को माना जाता है और कृषि जगत की सर्वाधिक कमजोर पक्ष भूमिहीन श्रमिक है। अतः धुरी को मजबूत बनाने के लिए इस कमजोरी के निदान की नितान्त आवश्यकता है। शासन, प्रशासन एवं ग्राम स्तर पर पंचायतों के द्वारा भूमिहीन कृषकों की दशा में सुधार के लिए सख्ती से प्रयास किया जाये।
संदर्भ-सूची
शोध रूपी भवन निर्माण के लिए भवन सामग्री रूपी समंक की आवश्यकता होती है, जिन्हें विभिन्न संदर्भों की सहायता से एकत्र किया जाता है। इन संदर्भित ग्रंथों की प्रमाणित सूची निम्न है:-
1. अग्रवाल, ए.एन., भारतीय कृषि का अर्थ व्यवस्था, विश्व प्रकाशन नई दिल्ली, वर्ष 2004-05
2. अग्रवाल, ए.एन., भारतीय कृषि का अर्थ व्यवस्था, विश्व प्रकाशन नई दिल्ली, वर्ष 2004-05
3. विन्सत, डी.एस., भारत में कृषि विकास, अनमोल पब्लिकेशन प्रा.लि. 2003, नई दिल्ली.
Received on 10.07.2017 Modified on 09.09.2017
Accepted on 18.10.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2017; 5(4): 223-228 .